अफझल तो पैदा ही होते है मरने के लिये

 sअफझल तो पैदा ही होते है मरने के लिये, तो फिर क्या फर्क पडता है की वो खान है या गुरू? जी हां ये इतिहास है 400 साल पहले का. छत्रपती शिवाजी महाराज ने प्रतापगड किले के नीचे अफझल खान को मारा था. अब संसद हमले का आरोपी अफझल गुरू को फाँसी दे दी गयी. सदियोंसे ये चलता आ रहा है. लेकिन ये इतिहास जेएनयू के उन मच्छरोंको मालूम नही जो भारत के बरबादी के नारे लगा रहे है. ऐसा कहा जाता है की जिनको इतिहास मालूम नही होता उनका कुछ भी भविष्य नही होता. पाकिस्तान में बैठे उस अलिबाबा के इशारे पर जेएनयू के ये सब चोर नाचने लगे. उमर खलिफ नाम का एक हरामखोर जिसने काश्मिर घाटी के कूछ अपने जैसे हरामियों को साथ लेकर जो तमाशा खडा किया, उनको कन्हैया कुमार जैसे हरामीयोंकी मदद मिली. उनको जेएनयू के बाकी गद्दारों का साथ मिला. और आग भडक गयी. जिस अफझल को भारतीय न्याय- व्यवस्थाने गद्दार साबित करके फाँसी पर लटकाया था. उसको शहीद साबित करने में ये सब गद्दार जुटे है. ये उमर खालिद पाकिस्तान स्थित आतंकी संघटन “जैश-ए-मोहम्मद” से संबंधित है. वो पाकिस्तान से आतंकवादी गतविधियोंकी ट्रेनिंग लेकर आया है. उसका पाकिस्तानी आका हाफिज सईद है. उसी के इशारों पर खुद नाच रहा है और दुसरों को भी नचा रहा है. सब आग लगा के वो सुअर साला पुलिस के डर से अपनी दूम पकड के किसी गटर में छूपकर बैठा है.
 अफझल 2वैसे भी जेएनयू कभी देशभक्ती के लिये प्रसिद्ध था ही नही. ये जो तमाशा चल रहा है ये एक साजिश के तहत चल रहा है. इसके मास्टर माईंड पाकिस्तान में बैठे हुए है. लेकिन कभी कभी ऐसा भी लगता है मास्टर माईंड के पीछे भी एक हाथ हो सकता है, काँग्रेस का हाथ. आपको झटका लगेगा, लेकिन हालात तो यही इशारा कर रहे है. क्यों की जिस तरह से काँग्रेस के युवराज डर्टी पॉलिटिक्स खेल रहे है, उससे तो ऐसा ही लगता है. उसमे और एक महत्त्वपूर्ण कडी है जिसको कोई नजरअंदाज नही कर सकता और वो है कुछ दिन पहले काँग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने एक पाकिस्तानी चॅनलसे पाकिस्तान में बात करते हुए कहा था, की मोदी सरकार को सत्ता से नीचे खिंचने के लिये पाकिस्तान हमें मदद करे. इस बात को कैसे कोई नजरअंदाज कर सकता है?

अफझल 3

आये दिन काँग्रेस के कुछ नेता आतंकवादियोंका बडे ही विनम्रतापूर्वक नाम ले रहे है. राहुल गांधी खुले तौर पर देशद्रोही नारेबाजी करनेवालोंका साथ दे रहे है. लाल बावटावाले उनके समर्थन में उतरे है. मायावती, इशरत के अब्बू नितीश कुमार सब के सब हाफिज सईद और पाकिस्तान का नमक अदा कर रहे है. सब के सब साले डर्टी पॉलिटिक्स खेल रहे है. नारेबाजी करनेवाले छात्र और राहुल गांधी दोनों भी पत्थर पर सर पटक रहे है. अफझल गुरू की फाँसी नही सहेंगे बोलनेवाले छात्रों को इतना भी होश नही है की अफझल गुरू को फाँसी काँग्रेस सरकार की कार्यकाल में ही दी गयी है. उनके ही युवराज उनके साथ खडे है. फिर मोदीजी के नाम से तमाशा क्यों हो रहा है? जेएनयू में देशद्रोही गतविधियां चल रही है तो ये तो बात अब सबके सामने आयी है. तो अब जहां देशद्रोही हरे साप पल रहे है, वो जगह बंद करने में ही सबकी भलाई है. सरकारी पैसोंसे ये देशद्रोही हरकते हो रही है. काँग्रेस और बाकी पार्टीयां जो आज इन देशद्रोही छात्रों का समर्थन कर रही है उनको अपनी राजनिती के बारे में सोचना होगा. अपनी निजी डर्टी पॉलिटिक्स के लिये ये देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड कर रहे है. काँग्रेस को तो देशप्रेम और देशद्रोह के बीच फासला भी तय करना मुश्किल हो गया है.

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पहले रोहित वेमुला हो गया, अब अफझल का भूत आ गया, इसके बाद और कोई नया बखेडा खडा कर देंगे. ये सिलसिला चालू रहेगा क्यों की काँग्रेस और बाकी मोदी विरोधी पार्टीयोंको कोई काम नही है. सब के सब मोदी के “मेक इन इंडिया” को “ब्रेक इन इंडिया” करने पे तुले है. सत्ता की लालच आदमी को किसी भी हद्द तक नीचे गिरा सकती है. सत्ता के लालच में ही रामायण और महाभारत हो गया था. सत्ता की लालच एक फियादीन को बेटी कहने को मजबूर कर सकती है. सत्ता की लालच देशद्रोहियोंके साथ हाथ मिलाने को मजबूर कर सकती है. ये सब एक षडयंत्र है. सरकार को इसके साथ सक्ती से निपटना होगा. चाहे वो छात्र हो या फिर कोई नेता हो, या पार्टी हो. जो भी इन छात्रों का समर्थन कर रहे है उनपर देशद्रोह का केस ठोकना चाहिये. इन सबको जड से उखाडना होगा. नही तो ये आग इतनी फैलगी की समज में नही आयेगा की देश के बाहर की शत्रू से लढे या अंदर की शत्रू के साथ लढे. इन देशद्रोही ताकतों से सक्ती से निपटना होगा. ये सब डर्टी पॉलिटिक्स है. आंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के हालात खराब दिखाकर मोदी सरकार की छबी बिगाडने की पूरी कोशिश हो रही है. इसिके तहत पहले अमिरखान, शाहरुख खान और कुछ सेलिब्रिटीज के मुंह से असहिष्णुता का मुद्दा उठाना, पुरस्कार वापसी, रोहित वेमुला और अब ये तमाशा. अगर मोदी सरकार इन सबके साथ सक्ती के साथ नही निपटेगी तो ये आग और ज्यादा फैलेगी और ना जाने क्या क्या राख कर देगी कहना मुश्किल है.

किशोर बोराटे.

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